
नई दिल्लीः सुप्रीम कोर्ट ने आज एक सुनवाई के दौरान बड़ा फैसला सुनाया। दरअसल, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एम एम सुंदरेश की पीठ ने 1968 की एक वसीयत के एक मामले में यह आदेश पारित किया। अगर कोई हिंदू पुरुष खुद से अर्जित की गई संपत्ति का मालिक है और वह अपनी पत्नी को वसीयत में सीमित हिस्सेदारी देता है तो इसे संपत्ति पर पूर्ण अधिकार नहीं माना जाएगा।
बता दें कि हरियाणा के एक व्यक्ति तुलसी राम ने 15 अप्रैल 1968 को उक्त वसीयत लिखी थी, जिसका 17 नवंबर 1969 को निधन हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले को खारिज करते हुए कहा कि दोषसिद्धि बिना पुष्टि के केवल मृत्यु पूर्व दिये गए बयान के आधार पर हो सकती है। इसी मामले में हाई कोर्ट ने आग लगाकर एक महिला को मार डालने के आरोपी उसके ससुर और एक अन्य रिश्तेदार को बरी कर दिया था।
हाई कोर्ट ने महिला के मृत्यु से पहले के बयान पर भरोसा करते हुए,
निचली अदालत के फैसले को सही ठहराया, जिसने दोनों आरोपियों को दोषी ठहराया था और आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। न्यायमूर्ति एम आर शाह और न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना की पीठ ने कहा कि मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गये मृत्यु पूर्व बयान पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है, जिसमें महिला ने विशेष रूप से कहा था कि आरोपियों ने पैसे की मांग को लेकर विवाद के कारण उसे आग लगा दी।
पीठ ने कहा कि हमें 22 दिसंबर, 2011 को मजिस्ट्रेट द्वारा दर्ज किये गए मृत्यु से पहले के बयान पर संदेह करने का कोई कारण नहीं दिखता है, जिसमें महिला ने विशेष रूप से कहा था कि पैसे की मांग को लेकर विवाद के कारण आरोपियों ने मिट्टी का तेल छिड़ककर उसे आग लगा दी। कोर्ट ने कहा कि अगर अदालत संतुष्ट है कि मृत्यु से पहले दिया गया बयान सही और स्वैच्छिक है, तो वह बिना पुष्टि के उसे सजा का आधार बना सकती है। पुलिस के मुताबिक, घटना 20 दिसंबर 2011 को मथुरा जिले में हुई थी और इसके बाद 9 जनवरी 2012 को महिला की मौत हो गई थी।
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