
झारखंड के चतरा, इटखोरी, कान्हाचट्टी, पथलगड्डा, गिद्धौर और मयूरहंड की लाइफलाइन मानी जाने वाली हेरू पुल की स्थिति अब जर्जर हो गई है फिर भी यह पुल डटा हुआ है। अगर यह पुल ध्वस्त हो जाता है तो इटखोरी, कान्हाचट्टी, गिद्धौर, मयूरहंड और चतरा प्रखंड के अलावा चौपारण और हजारीबाग का संपर्क चतरा से टूट जाएगा। यह पुल अंग्रेजों के जमाने का बना हुआ है। इस पुल की उम्र सौ साल से अधिक हो चुकी है। वैसे इस पुल के स्थान पर नए पुल का निर्माण पिछले कई वर्षों से चल रहा है, लेकिन लापरवाही के कारण अबतक बनकर तैयार नहीं हुआ है।
बीच में पुल का निर्माण रुक गया था। फिलहाल संवेदक द्वारा निर्माण कार्य प्रांरभ करा दिया गया है। हेरू पुल के बाद कई पुल बने, लेकिन 10-20 साल होते-होते सारे पुल जमींदोज हो गए लेकिन हेरू पुल अभी भी टिका हुआ है। इस पुल से प्रतिदिन सैंकड़ों कोयला लदे भारी-भरकम वाहन गुजरते होते हैं। हालांकि, भारी वाहनों के गुजरने पर पुल हिलता जरूर है। इसलिए पुल के ध्वस्त होने का खतरा हमेशा बना रहता है। अब जो भी पुल बन रहा है, उसकी उम्र 25 वर्ष से अधिक नहीं होती है।
मार्च 2024 के पहले हेरू नदी पर बन रहा पुल हो जाएगा तैयार
इसी तरह का एक पुल इटखोरी के महाने नदी पर भी है। हालांकि, वहां दूसरा नया पुल बन चुका है और अंग्रेजों के जमाने के पुल को कंडम घोषित कर दिया गया है। अब पुराने पुल से कोई वाहन नहीं गुजरता है। इस संबंध में सहायक अभियंता आनंद प्रकाश पांडे का कहना है कि मार्च 2024 के पहले हेरू नदी पर बन रहा पुल तैयार हो जाएगा।
हालांकि, पुल बनकर तैयार है, केवल एप्रोच रोड का काम बाकी है। नगवां निवासी 70 वर्षीय भोला राम, बसंत मिस्त्री, जात्राहीबाग निवासी शालिग्राम सिंह, अधिवक्ता प्रद्युम्न मिश्रा आदि का कहना है कि हेरू पुल उनलोगों के होश संभालने से पहले का है। प्रद्युम्न मिश्रा के पिताजी बताते थे कि जब वे दस वर्ष के थे तो उस समय अंग्रेजों ने यह पुल बनवाया था।

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