
उत्तर प्रदेश का पाकिस्तान से कोई सीधा संबंध नहीं है. ना ही उत्तर प्रदेश की सीमा पाकिस्तान से लगती है. लेकिन उत्तर प्रदेश के चुनावी माहौल पर पाकिस्तान और जिन्ना हावी होते जा रहे हैं. कोरोना महामारी, इससे जन्मा आर्थिक संकट, बेरोज़गारी, किसान आंदोलन – ये कुछ मुद्दे ऐसे हैं जिनकी चर्चा होती रही है. लेकिन ये मुद्दे अब पीछे छूटते जा रहे है और ध्रुवीकरण की राजनीति ने जनता के मुद्दों के दबा दिया है.
हाल के दिनों में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सबसे पहले अपने वक्तव्य में पाकिस्तान के संस्थापक और भारत की आज़ादी के आंदोलन में शामिल रहे रहे मोहम्मद अली जिन्ना का ज़िक्र किया. इसके बाद जिन्ना राजनीतिक भाषणों और बहसों के केंद्र में आ गए.वहीं एक साक्षात्कार के दौरान अखिलेश यादव ने कहा कि ‘हमारा नंबर वन दुश्मन पाकिस्तान नहीं है. उनका ये बयान भी मीडिया की सुर्ख़ियाँ बन गया.
पाकिस्तान, जिन्ना, तालिबान और मुग़ल जैसे शब्द सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी अखिलेश यादव पर निशाना साधते हुए कहा कि ‘जिन्हें पाकिस्तान दुश्मन नहीं लगता, उन्हें जिन्ना दोस्त लगता है.’ पाकिस्तान, जिन्ना, तालिबान और मुग़ल जैसे शब्द सिर्फ़ राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है बल्कि टीवी चैनलों की बहसें इनसे भरी पड़ी हैं जिससे सवाल उठने लगा है कि क्या ऐसे में ज़मीनी मुद्दे पीछे छूट सकते हैं.समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता अब्दुल हफ़ीज़ गांधी कहते हैं, “भाजपा विकास की राजनीति करने में विफल रही है, यूपी का विकास नहीं कर सकी है, इसलिए ही ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है.”
भारतीय जनता पार्टी इन आरोपों को सिरे से ख़ारिज करती है. पार्टी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी कहते हैं कि पाकिस्तान की चर्चा और जिन्ना की एंट्री अखिलेश यादव ने ही की है.वे कहते हैं,”सरदार पटेल की जयंती के दिन पूरा देश राष्ट्रीय एकता दिवस मना रहा था और अखिलेश यादव बिना किसी प्रसंग के जिन्ना का गुणगान कर रहे थे. पाकिस्तान का नाम अखिलेश ले रहे हैं, जिन्ना का नाम अखिलेश ले रहे हैं, उनकी पार्टी के सांसद शफीक़ुर्रहमान बर्क़ तालिबान को स्वतंत्रता आंदोलनकारी कह रहे हैं और आरोप बीजेपी पर लगाया जा रहा.
यदि ध्रुवीकरण होता है तो इससे समाजवादी पार्टी को भी फ़ायदा होगा. सिर्फ़ एक दल करेगा तो ध्रुवीकरण नहीं होगा.
है कि हम पाकिस्तान और जिन्ना को चुनाव में ला रहे हैं. हम सिर्फ उनके बयान पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं. ये स्पष्ट है कि चुनाव में पाकिस्तान, जिन्ना और तालिबान का नाम लेकर कौन लाभ लेना चाहता है.”वहीं उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के अल्पसंख्यक मामलों के अध्यक्ष शाहनवाज़ आलम कहते हैं कि चुनाव में पाकिस्तान और जिन्ना का इस्तेमाल सिर्फ़ बीजेपी नहीं कर रही.आलम कहते हैं, “यदि ध्रुवीकरण होता है तो इससे समाजवादी पार्टी को भी फ़ायदा होगा. सिर्फ़ एक दल करेगा तो ध्रुवीकरण नहीं होगा. अखिलेश ने उसी दिन जिन्ना का नाम लिया जिस दिन प्रियंका गांधी की बड़ी रैली थी. अखिलेश ने कहा कि जिन्ना बहुत सेकुलर और अच्छे आदमी थे. अखिलेश को जिन्ना तो याद आए लेकिन अपनी ही पार्टी के आज़म ख़ान याद नहीं आए.
चुनाव को जनता के मुद्दों से काट कर ध्रुवीकृत करने की एक स्पष्ट कोशिश नज़र आती है.
आलम कहते हैं, “चुनाव को जनता के मुद्दों से काट कर ध्रुवीकृत करने की एक स्पष्ट कोशिश नज़र आती है और ये बीजेपी और समाजवादी पार्टी दोनों कर रही हैं. सपा और भाजपा इसे द्विपक्षीय मुक़ाबला बना देना चाहती है. आमतौर पर लगता है कि धार्मिक ध्रुवीकरण की इस राजनीति में सिर्फ़ भाजपा शामिल है, लेकिन ऐसा नहीं है.”समाजवादी पार्टी प्रवक्ता हफ़ीज़ गांधी कहते हैं, “बीजेपी ना बिजली की बढ़ी हुई दरों पर बात करना चाहती है, ना ही बेरोज़गारी की भयावह स्थिति या सड़कों की जर्जर हालत पर बात करना चाहती है. वो महिलाओं के उत्पीड़न पर बात नहीं करना चाहते हैं. बीजेपी के पास कोई मुद्दा नहीं है, इसलिए ही वो धार्मिक ध्रुवीकरण कर रही है.
बीजेपी का मुद्दा विकास ही है ध्रुवीकरण नहीं.
त्रिपाठी का तर्क है कि बीजेपी का मुद्दा विकास ही है ध्रुवीकरण नहीं. वो कहते हैं, “हम चुनौती देकर ये कह रहे हैं कि विपक्षी दल बिजली के मुद्दे पर हमसे बहस करे, सड़कों, स्वास्थ, शिक्षा के मसले पर बहस करे. हम हर बुनियादी मुद्दे पर बहस करना चाहते हैं लेकिन समाजवादी पार्टी की पोल खुल जाती है क्योंकि हम फ़र्क़ साफ़ दिखाते हैं.”बीजेपी शासनकाल में अल्पसंख्यकों की उपेक्षा के आरोपों को खारिज करते हुए त्रिपाठी कहते हैं. हमने योजनाओं का लाभ देने में मुसलमानों को उनकी आबादी के अनुपात से अधिक हिस्सेदारी दी है.
मगर जानकार बताते हैं कि यूपी के मुसलमानों ने बीजेपी के प्रति झुकाव नहीं दिखाया है. बीजेपी गठबंधन ने भी अभी तक सिर्फ़ एक ही मुसलमान उम्मीदवार को टिकट दिया है. वसीम अकरम त्यागी मानते हैं कि इस माहौल ने मुसलमानों को समाजवादी पार्टी की तरफ़ धकेल दिया है.त्यागी कहते हैं, “भारतीय जनता पार्टी ने 80:20 का नारा उछाल कर मुसलमानों को एक बार फिर समाजवादी पार्टी की तरफ धकेलने में भी भूमिका निभाई है. अखिलेश यादव ही चुनाव में गलतियाँ नहीं कर रहे हैं, बल्कि भारतीय जनता पार्टी की तरफ से भी भारी गलतियाँ की जा रही हैं.
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