
बिरसा मुंडा ने बहुत कम उम्र में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ विद्रोह का बिगुल बजा दिया था. उन्होंने ये लड़ाई तब शुरू की थी जब वो 25 साल के भी नहीं हुए थे. उनका जन्म 15 नवंबर, 1875 को मुंडा जनजाति में हुआ था। खूंटी के उलिहातू में पिता सुगना मुंडा और करमी मुंडा के घर जन्मे बिरसा मुंडा ने साहस की स्याही से पुरुषार्थ के पृष्ठ पर शौर्य की शब्दावली रच डाली।
*भगवन बिरसा मुंडा कब बने “धरती -आबा”?:*
1897 में क़रीब दो साल जेल में सज़ा काटने के बाद रिहा होकर जब बिरसा और उनके साथी जेल के गेट से बाहर निकले तो क़रीब 25 लोग उनके स्वागत में खड़े थे। उन्होंने बिरसा को देखते ही नारा लगाया, ‘बिरसा भगवान की जय’! बिरसा ने कहा आप सबको मुझे भगवान नहीं कहना चाहिए. इस लड़ाई में हम सब बराबर हैं। बिरसा के साथी भरमी ने कहा हमने आपको एक दूसरा नाम भी दिया था ‘धरती आबा.’ अब हम आपको इसी नाम से पुकारेंगे।
*बिरसा का ईसाई धर्म अपनाना फिर छोड़ना साथ ही आज की राजनीति में उनके के गौरवशाली इतिहास को हिंदुत्वादी चासनी में डुबोने का प्रयास:* बिरसा मुंडा की आरंभिक पढ़ाई सालगा में जयपाल नाग की देखरेख में हुई थी. उन्होंने एक जर्मन मिशन स्कूल में दाख़िला लेने के लिए ईसाई धर्म अपना लिया था।
कहानी मशहूर है कि उनके एक ईसाई अध्यापक ने एक बार कक्षा में मुंडा लोगों के लिए अपशब्दों का प्रयोग किया. बिरसा ने विरोध में अपनी कक्षा का बहिष्कार कर दिया। उसके बाद उन्हें कक्षा में वापस नहीं लिया गया और स्कूल से भी निकाल दिया गया। बाद में उन्होंने ईसाई धर्म का परित्याग कर दिया और अपना नया धर्म ‘बिरसैत’ शुरू किया. जल्दी ही मुंडा और उराँव जनजाति के लोग उनके धर्म को मानने लगे. जल्दी ही, उन्होंने अंग्रेज़ों की धर्म बदलवाने की नीति को एक तरह की चुनौती के तौर पर लिया।
लेकिन आज की राजनीति में बिरसा के ईसाई धर्म को छोड़ने वाली बिंदुओं को गलत तरीके तोड़ – मरोड़ कर उन्हे हिंदुत्ववादी चासनी में डुबोने का अथक प्रयास चल रहा है जो कि अपने आप में बेहद हास्यास्पद है। बिरसा ने सिर्फ ब्रिटिश हुकूमत द्वारा चल रहे तमाम हथकंडों को ही चुनौती नहीं दी बल्कि यहां के देशी शोषणकारियों जैसे हिन्दू जमींदारों, साहूकारों और तमाम जाति-विशेष आधारित हिंदूधर्म के ठेकदारों द्वारा थोपी गई शोषण व्यवस्था का खुलकर विरोध किया और उन्हें मुंडा भाषा में ‘दिकू’ का संज्ञा दिया।
बिरसा ने आदिवासी समाज के लोगों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य को खोखला बनाने वाली अंधविश्वास– जादू टोना जैसी सामाजिक कुरीतियों और खासकर नशा पान जैसी बुराइयों के खिलाफ सामाजिक जन जागरण को अपने आंदोलनात्मक गोलबंदियों का अहम हिस्सा बनाया। गाँव गाँव में ‘ बिरसाईत धर्म’ के प्रचार कर साफ़ सन्देश दिया कि आदिवासियों को पुनः अपने प्राकृति सम्मत व्यवस्था और अपने आधिकारों के लिए सजग होने की जरुरत है। जिसके अनुयायियों द्वारा रचे और गाये गए गीतों से उस दौर के आदिवासियों के जीवनवृत को भली भांति समझा जा सकता है।
*जाति है कि जाती नही:*
यूं तो भारतीय उपमहाद्विप में वैदिक काल से ही जाति का वर्चस्व कायम कर दिया गया और आज तक चला आ रहा। इस जातिवाद का घिनौना वर्चस्व का घुट बाहरी शासकों ने भी चखा है। भले ही भारत के हर समुदाय और संप्रदायों ने ब्रिटिश उपनिवेशवाद के खिलाफ़ जंग छेड़ रखी थी लेकीन भारत के दलित – आदिवासी क्रांतिकारियों के सामने दो मोर्चों पर संघर्ष था, एक तो कंपनी सरकार ब्रिटिश हुकूमत और दुसरा यहां के ही जातिवादी शोषक वर्ग। जंग-ए आज़ादी में ब्रिटिश हुकूमत और उनके नुमाइंदों ने समय-समय पर देशभक्त क्रांतिकारियों को भी जाति-सूचक शब्दों से अपमानित करने में कोई कसर नही छोड़ी।
“मैं बात बिरसा मुंडा की कर रहा हूं जिन्होने सन 1897 में जब पूरे 2 साल 12 दिन जेल में बिताने के बाद रिहा किया जा रहा था. उनके दो और साथियों–डोंका मुंडा और मझिया मुंडा-को भी छोड़ा जा रहा था। जेल के क्लर्क ने रिहाई के कागज़ात के साथ कपड़ों का एक छोटा-सा बंडल लेने को कहा। बिरसा ने अपने पुराने सामान पर एक नज़र डाली और वो ये देख कर थोड़े परेशान हुए कि उसमें उनकी चप्पल और पगड़ी नहीं थी।
जब बिरसा के साथी डोंका मुंडा ने पूछा कि बिरसा की चप्पल और पगड़ी कहाँ है, तो जेलर ने जवाब दिया कि कमिश्नर फ़ोर्ब्स के आदेश हैं कि हम आपकी चप्पल और पगड़ी आपको न दें क्योंकि सिर्फ़ ब्राह्मण, ज़मींदारों और साहूकारों को ही चप्पल और पगड़ी पहनने की इजाज़त है।”
*मुख़बिरी की वजह से हुई थी बिरसा की गिरफ़्तारी*
बिरसा के पकड़े जाने का विवरण सिंहभूम के कमिश्नर ने बंगाल के मुख्य सचिव को भेजा था। 500 रुपए का इनाम घोषित होने के बाद पास के गाँव मानमारू और जरीकल के सात लोग बिरसा मुंडा की तलाश में जुट गए। तीन फ़रवरी 1900 को चक्रधरपुर में उनकी गिरफ्तारी हुई। बिरसा को पकड़वाने वाले लोगों को 500 रुपए नक़द इनाम के तौर पर दिए गए। कमिश्नर ने आदेश दिया कि बिरसा को चाईबासा न ले जाकर राँची ले जाया जाए।
बिरसा के मुखीबिरी और गिरफ्तारी का जिक्र करते हुए महाश्वेता देवी अपनी किताब “अरण्येर अधिकार” में लिखा है: बिरसा के हाथों में हथकड़ियां थी दोनों ओर दो सिपाही थे बिरसा के सिर पर पगड़ी थी धोती पहने थे बदन पर और कुछ नहीं था। वहां उनके अनुयायियों और चाहने वालों की भीड़ थी औरतें छाती पीट रही थी और लोग कह रहे थे जिसने भी तुम्हे पकड़वाया वो माघ महीना भी पूरा होते नहीं देख पायेंगे।
परंतु बिरसा उन मुखबिरों पर उतना खफा नही थे उन्होंने कहा पकड़वा दिया क्यों न पकड़वा देते, डिप्टी कमिश्नर ने उन्हें गिन कर पांच सौ रुपए जो दिए हैं। 500 रुपए बहुत होते हैं कभी किसी मुंडा के पास नही हुआ और न होते। मुंडा कभी सोते हुए सपने भी देखता है तो उन्हें महारानी मार्का 10 ही दिखते हैं। वो बिरसा को क्यों न पकड़वा देते उन बेचारों को पूरे 500 रुपए मिले हैं।
*संघर्ष और नारे*
बिरसा के संघर्ष की शुरुआत चाईबासा में हुई थी जहाँ उन्होंने 1886 से 1890 तक चार वर्ष बिताए. वहीं से अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ एक आदिवासी आंदोलन की शुरुआत हुई।
इस दौरान उन्होंने एक नारा दिया –
“अबूया राज एते जाना/ महारानी राज टुडू जाना” (यानी अब मुंडा राज शुरू हो गया है और महारानी का राज ख़त्म हो गया है). बिरसा मुंडा ने अपने लोगों को आदेश दिया कि वो सरकार को कोई टैक्स न दें. 19वीं सदी के अंत में अंग्रेज़ों की भूमि नीति ने परंपरागत आदिवासी भूमि व्यवस्था को छिन्न-भिन्न कर दिया था.
साहूकारों ने उनकी ज़मीन पर क़ब्ज़ा करना शुरू कर दिया था और आदिवासियों को जंगल के संसाधनों का इस्तेमाल करने से रोक दिया गया था. मुंडा लोगों ने एक आंदोलन की शुरुआत की थी जिसे उन्होंने ‘उलगुलान’ का नाम दिया था। उलगुलान का शाब्दिक अर्थ – महान क्रांति या महाविद्रोह,
बिरसा के उलगुलान की याद में हरिराम मीणा द्वारा रचित एक कविता का कवितांस है:
‘‘मैं केवल देह नहीं
मैं जंगल का पुश्तैनी दावेदार हूँ
पुश्तें और उनके दाव मरते नहीं
मैं भी मर नहीं सकता
मुझे कोई भी
जंगलों से बेदखल नहीं कर सकता
उलगुलान!’
उलगुलान!!
उलगुलान!!!‘‘
*बिरसा, जेल और अन्तिम पल*
एक दिन बिरसा जब सोकर उठे तो उन्हें तेज़ बुख़ार और पूरे शरीर में भयानक दर्द था. उनका गला भी इतना ख़राब हो चुका था कि उनके लिए एक घूंट पानी पीना भी असंभव हो गया था। कुछ दिनों में उन्हें ख़ून की उल्टियां शुरू हो गई थीं। 9 जून, 1900 को बिरसा ने सुबह 9 बजे दम तोड़ दिया।
अपने अंतिम क्षणों में बिरसा कुछ पलों के लिए होश में आए। उनके मुंह से शब्द निकले, ‘मैं सिर्फ़ एक शरीर नहीं हूँ. मैं मर नहीं सकता. उलगुलान (आंदोलन) जारी रहेगा। बिरसा की मृत्यु के साथ ही मुंडा आंदोलन शिथिल पड़ गया था, लेकिन उनकी मौत के आठ साल बाद अंग्रेज़ सरकार ने ‘छोटानागपुर टेनेंसी एक्ट’ पारित किया जिसमें प्रावधान था कि आदिवासियों की भूमि को ग़ैर-आदिवासी नहीं ख़रीद नहीं सकते।
आलेख: मिसाल

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