
देश में ओमिक्रॉन वैरिएंट के अब तक सिर्फ तीन मामले सामने आए हैं। संभव है अगले कुछ दिनों में इसके मामलों की संख्या में और बढ़ोतरी, क्योंकि वायरस का यह बदला हुआ स्वरूप ज्यादा से ज्यादा लोगों को न सिर्फ संक्रमित करता है, बल्कि उन पर अपना प्रभाव भी डालता है। ICMR के वैज्ञानिकों का दावा है कि इस वायरस के बदले हुए स्वरूप की आक्रामकता ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। ICMR के चीफ एपिडमोलॉजिस्ट डॉ. समीरन पांडा का कहना है कि जो वायरस ज्यादा से ज्यादा फैलता है, वह घातक नहीं हो सकता। इसके न सिर्फ प्रमाण हैं, बल्कि वैज्ञानिक तथ्यों पर यह बात कही जा रही है। इसलिए लोगों को इस वायरस के बदले हुए स्वरूप से बेवजह डरने की जरूरत नहीं है. लेकिन सतर्कता बरतना बेहद जरूरी है।
फैलने की दर अधिक, लेकिन प्रभाव कम
इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च के मुख्य महामारी विशेषज्ञ डॉ. समीरन पांडा कहते हैं कि ओमिक्रॉन वैरिएंट से लेकर डेल्टा और अन्य वैरिएंट में अभी तक के अध्ययन के दौरान सिर्फ यही पाया गया कि जिन बदले हुए स्वरूपों में ज्यादा से ज्यादा फैलने की आक्रामकता थी, उनका लोगों पर असर कम हुआ। वजह बताते हुए डॉ पांडा कहते हैं कि जिन बदले हुए स्वरूपों में लक्षण बहुत हल्के होते हैं और उनमें संक्रामक क्षमता ज्यादा होती है, वह अपना असर नहीं दिखा पाते हैं। उदाहरण देते हुए डॉ समीरन कहते हैं कि जो वायरस बहुत घातक होगा और अपने होस्ट (संक्रमित व्यक्ति) को ही मार डाले, तो ऐसे में मृतक व्यक्ति से संक्रमण फैलने का खतरा न के बराबर होता है। ऐसी दशा में संक्रमण का स्तर उतनी तेजी से नहीं फैलता है, जितनी तेजी से शुरुआती दौर में ओमिक्रॉन स्वरूप के मामले देखे गए हैं।

शशांक शेखर विगत 30 वर्षों से पत्रकारिता, आकाशवाणी व सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं साथ ही लघु/फीचर फिल्मों व वृत्त चित्रों के लिए कथा-लेखन का कार्य भी विगत डेढ़ दशकों से कर रहे हैं. मशाल न्यूज़ में पिछले लगभग ढाई वर्षों से कार्यरत हैं.
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