
सूरत के निर्विरोध चयन को तत्काल रद्द करने की चुनाव आयोग से मांग
गुजरात के सूरत संसदीय क्षेत्र में निर्विरोध चयन की जो दुर्घटना घटित हुई है, वह दरअसल ‘एक चुनाव क्षेत्र एक उम्मीदवार‘ का एक नया फासिस्ट प्रयोग है। इसकी प्रेरणा संभवत: भाजपा को स्थानीय चुनाव में बड़े पैमाने पर निर्विरोध उम्मीदवारों के चुने जाने से मिली हो। उक्त बयान जारी करते हुए जसवा झारखंड संयोजक भाषाण मानमी ने कहा कि यह साजिश निन्दनीय है। चुनाव आयोग से मांग है कि वह सूरत के निर्विरोध चयन को तत्काल रद्द करे और वहां के लिए चुनाव की अधिसूचना फिर से जारी कर नोमिनेशन से लेकर वोट देने तक की पूरी चुनाव प्रक्रिया नए सिरे से शुरू करे।
सूरत में पूरी प्रक्रिया नये सिरे से शुरू करना चुनाव आयोग का एक संवैधानिक दायित्व
सूरत में पूरी प्रक्रिया नये सिरे से शुरू करना चुनाव आयोग का एक संवैधानिक दायित्व है। चुनाव से पहले उम्मीदवार की मौत से जिस तरह फिर से प्रक्रिया शुरू होती है , उसी तरह यहां भी हो सकती है, होनी चाहिए। यहां एक योजना के तहत उम्मीदवारी भर चुके लोगों को हटाया गया है। उम्मीदवार की मौत की तरह उम्मीदवारी के सुनियोजित सफाया का यह मामला है। वैसे तो यह किसी भी स्तर पर नहीं होना चाहिए, देश की शीर्षस्थ विधायिका के चुनाव में तो कतई नहीं होना चाहिए । ऐसी परिघटना जनता को कुछ उम्मीदवारों के बीच से अपने मत से प्रतिनिधि चयन करने का मौका छीन लेती है। तकनीकी आधार पर बिना चुनाव प्रतिनिधि थोप देना लोकतंत्र और चुनाव की मूल भावना की हत्या है।
विरोध में कोई व्यक्ति न बचा होने पर भी नोटा तो था
उक्त बयान में कहा गया है कि चुनावी लोकतंत्र की मूल भावना है कि हमें उम्मीदवारों के बीच से बहुमत से अपने प्रतिनिधि का चयन करना है । इस मूल तत्वभाव को देश की शीर्ष विधायिका में कायम रखने के लिए इस तरह की घटना को रोकने की सख्त जरूरत है। इसका एक और तकनीकी पक्ष है, जिसकी अवहेलना हुई है। विरोध में कोई व्यक्ति न बचा होने पर भी नोटा तो था। निर्विरोध उम्मीदवार के मुकाबले नोटा के पक्ष में कितना जनमत था, यह प्रक्रिया तो पूरी करनी थी। यह प्रक्रिया नहीं निभाई गयी।
जनता को मत का अवसर देने से वंचित करने की घटना
यह घटना एक क्षेत्र की समस्त मताधिकारी जनता को मत का अवसर देने से वंचित करने की घटना है । अगर यह ऐसा सिलसिला मान्य हो गया तो साजिश की एक श्रृंखला चल सकती है। कुछ लोग अपनी उम्मीदवारी भरेंगे और शासक दल प्रलोभन से या आतंक से सभी उम्मीदवारों को बैठा सकता है। यह जनता पर मजबूरन एक अनिर्वाचित उम्मीदवार को अपना प्रतिनिधि मानने की बाध्यता थोपता है।
यह एक अपवादात्मक घटना है
अभी यह एक अपवादात्मक घटना है । इस कारण से अभी से ही इस पर रोक होना चाहिए। चुनाव आयोग को चुनाव की संसदीय चुनाव की मूल भावना, भारतीय लोक संविधान में वर्णित भारतीय लोकतंत्र की मूल भावना को जिंदा रखने के लिए यह कदम तत्काल उठाना चाहिए । अगर वह ऐसा नहीं करता तो इसका अर्थ यह होगा कि चुनाव आयोग भी भाजपा और उसके सहयोगियों द्वारा रचे गए इस साजिश का एक साझेदार है । उसकी विश्वसनीयता और निष्पक्षता तो खंडित होगी ही। वह निंदनीय और दंडनीय भूमिका की नैतिक और संवैधानिक अपराधी भी होगा।

शशांक शेखर विगत 30 वर्षों से पत्रकारिता, आकाशवाणी व सामाजिक कार्यों से जुड़े हुए हैं साथ ही लघु/फीचर फिल्मों व वृत्त चित्रों के लिए कथा-लेखन का कार्य भी विगत डेढ़ दशकों से कर रहे हैं. मशाल न्यूज़ में पिछले लगभग ढाई वर्षों से कार्यरत हैं.
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